के. विक्रमराव

आजादी के अमृत महोत्सव के दौर में पश्चिमी लखनऊ की डेढ़ सदी पुरानी इमारत रिफा-ए-आम का अधिग्रहण तथा जीर्णोध्दार संभव था। शासन उदासीन रहा। नतीजतन यह ऐतिहासिक भवन उपेक्षित होकर ढहता रहा। भू माफियाओं की दृष्टि भी पैनी होती गयी। एक माफिया ने तो 1857 वाले बेलीगारद के अंदर ही बहुमंजिला ढांचा खड़ा कर दिया था। योगी सरकार के बुल्डोजर ने उसे गिरा दिया।

रिफा-ए-आम साक्षी रहा है गांधी-तिलक-जिन्ना-नेहरू-पटेल की सभाओं का। उनके अंग्रेज-विरोधी भाषणों का। यह लखनऊ सिटी स्टेशन से लगा हुआ है। राजभवन से 5 किलोमीटर दूर। इस बौद्धिक केंद्र पर एक अखबारी रपट कहती है: “रिफा-ए-आम” क्लब ग्राउंड को अवैध बस संचालन का अड्डा बना रखा गया था। डग्गामार बसों के संचालन की सूचना पर जेसीपी एलओ ने शुक्रवार को छापा मारा। मौके पर मिली 11 डग्गामार बसों को सीज करने के साथ ही आठ चालकों को दबोचा गया। इसके साथ ही संचालकों के खिलाफ केस दर्ज करवाया गया है।”

इसके पूर्व (2 अप्रैल 2022) के एक अन्य समाचार के अनुसार-“अवैध रूप से कब्जाए जमीन पर शादी समारोह के आयोजन के साथ ही वहाँ बाजार भी लगाए जा रहे हैं। किराए पर दुकानें भी उठाई गईं। लंबे समय से दाऊद इब्राहिम के गुर्गे यहाँ अवैध कब्जा जमाये हुए थे। बाकायदा सुनियोजित तरीके से इस जमीन पर करोड़ों रुपए का कारोबार किया जा रहा है। एलडीए की ओर से वजीरगंज थाने में दर्ज एफआईआर के मुताबिक रिवर बैंक     कॉलोनी-स्थित खसरा नंबर 147 नजूल की जमीन है। इसे रिफा-ए-आम क्लब योजना के लिए आरक्षित किया गया था।‘’

गारा, गुम्मा, चारा, चूरा, आलन से बना यह संघर्ष का प्रतीक तो है, पर यह प्रत्यक्षदर्शी भी रहा फिरंगियों के खिलाफ भारत की एक मुहिम का। मोहम्मद अली जिन्ना तब तक हिंदुस्तानी थे, विभाजन के समर्थक नहीं थे। इसी क्लब के प्रांगण में हिन्दू-मुस्लिम एकता पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग की एक संयुक्त बैठक हुई थी जिसके कारण 1916 का लखनऊ समझौता हुआ।

महात्मा गांधी ने 15 अक्तूबर 1920 को हिंदू-मुस्लिम एकता पर उद्बोधन के लिए इस भवन का दौरा किया। अप्रैल 26, 1922 को जवाहरलाल नेहरू और वल्लभभाई पटेल ने स्थानीय लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए भाषण दिए। स्वदेशी आंदोलन को तेज करने के लिए प्रगतिशील लेखक आंदोलन 10 अप्रैल 1936 में यहीं प्रारम्भ किया गया था। इसे मुंशी प्रेमचंद ने संबोधित किया था।

इसी रिफा-ए-आम से जुडी है चारबाग रेलवे स्टेशन पर हुई एक घटना। इसी प्‍लेटफॉर्म पर बापू से जवाहरलाल नेहरू पहली बार मिले थे। तब दो खोमचेवाले चाय बेच रहे थे। उनकी पुकार थी: “हिन्दू चाय” और “मुस्लिम चाय।” बापू ने दोनों को बुलाया। तीसरा कुल्हड़ लिया। दोनों से आधी-आधी चाय ली और तीसरे कुल्लड़ में डाली। फिर कहा यह हिंदुस्तानी चाय है। इसे बेचो।” यहीं से विदेशी साम्राज्य की नींव कमजोर होनी चालू हो गई थी।

इस क्लब के मूल में एक जनवादी मकसद भी था। तब मोहम्मदबाग क्लब और यूनाइटेड सर्विसेज क्लब को लाट साहब ने निर्मित किया था। वहां कुत्तों और हिंदुस्तानियों का प्रवेश वर्जित था। प्रतिरोध में अवध के नवाबी खानदान ने रिफा-ए-आम क्लब की स्थापना की थी। क्लब आज जर्जर हालत में है। एक समय में यह भारत में राष्ट्रीय आंदोलनों का केंद्र हुआ करता था।

फ़ारसी शब्द “रिफ़ा” का मतलब होता है ख़ुशी और “आम” का मतलब है सामान्य। ये क्लब सामान्य लोगों को ख़ुशियां देता था। इसका मकसद रहा था कि साधारण लखनवी और अन्य आगन्तुकों के वास्ते मिलने की जगह हो। स्वाधीनता के शुरुआती पाँच छः दशकों से अंग्रेजों के दौर तक आम हिंदुस्तानियों के लिए खुला, यह लखनऊ का पहला क्लब था। इसीलिए इसका नाम रिफा-ए-आम (जनहित) क्लब रखा गया था।

इसी जगह प्रथम विश्वयुद्ध के समय होमरूल लीग के जलसे आयोजित होते थे। इससे अवध के शिया नवाबों ने मजहबी सामंजस्य कायम किया था। यहीं पर पहले विश्वयुद्ध के जमाने में होमरूल लीग का वह जलसा होना तय हुआ था जहां एनी बेसेंट की गिरफ्तारी पर प्रतिरोध जताने के लिए शहर के राष्ट्रभक्त जमा हुये थे। लेकिन अंग्रेज सरकार ने इसे गैरकानूनी करार दिया था।

ये लखनऊ में अपने किस्म की पहली घटना थी। तब हथियारबंद पुलिस रिफा-ए-आम में भर गई थी। सारे शहर में जबरदस्त सनसनी फैल गई थी। यहीं पर महात्मा गांधी ने लखनऊ वालों से असहयोग आंदोलन से जुड़ने की अपील की थी। इस खूबसूरत इमारत को अब लोगों ने इस कदर नुकसान पहुंचाया है कि ये नीचे से एकदम कमजोर हो चुकी है। इस पर अधिकार के लिए कई पक्षों में जंग छिड़ी हुई है।

बिल्डरों और भू-माफिया की बुरी नजर भी इस पर है। इसका ऐतिहासिक मैदान कूड़ा डालने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। जिस कारण यहां गंदगी का अंबार है। ये नशेड़ियों का भी अड्डा है। इस पर गैरकानूनी ढंग से डग्गामार बसें खड़ी की जा रही हैं।

रिफा-ए-आम की बदहाली पर अवधी संस्कृति के जानकार स्व. योगेश प्रवीन ने कहा था- “इस जगह की हालत राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक गौरव को लेकर हमारी शोशेबाजी की पोल खोलती है। पता चलता है कि इतिहास को लेकर हम असल में कितने संजीदा और संवेदनशील हैं। ये इस इमारत की बदकिस्मती है कि ये लखनऊ में है, जहां राष्ट्रीय इतिहास को कूड़े की वस्तु समझा जाता है। यही अगर किसी सही जगह होती तो देशप्रेमियों का तीर्थ कहलाती।”

अवध के कुछ इस्लामी शासकों, जिनकी राजधानी लखनऊ थी, ने विदेशी आक्रमणकारियों को हराया था। लोदी बादशाहों की मदद कर अवध के नवाबों ने बाबर का भी विरोध किया था। तभी सआदत अली खान ने स्वतंत्र नवाब वंश की स्थापना की थी। अवध के नवाब शुजाउद्दौला बक्सर (1764) के युद्ध मे ब्रिटिश जनरल हेक्टर मुनरो से लड़े थे। यहीं की बेगम हजरत महल ने तो 1857 में फिरंगियों को कड़ी टक्कर दी थी।

स्वाधीनता संघर्ष के केन्द्रों तथा प्रतीकों को संवारने हेतु नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने बीड़ा उठाया है। रिफा-ए-आम क्लब आजादी की थाती है। अतः इसे सँवारने हेतु प्रधानमंत्री से गुहार है। खासकर उनके सहयोगी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से।
(लेखक की सोशल मीडिया पोस्‍ट से साभार)
(मध्‍यमत)
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