गिरीश उपाध्‍याय

कोरोना महामारी के दूसरे दौर के महासंकट से जूझ रहे मध्‍यप्रदेश ने शुरुआती जोरदार झटकों के बाद धीरे-धीरे संभलना शुरू कर दिया है। कुछ दिनों पहले तक जिस तरह रेमडेसिविर की मारामारी और ऑक्‍सीजन की किल्‍लत का सामना कोरोना मरीजों को करना पड़ रहा था उसमें कमी दिखाई दे रही है। कोविड पॉजिटिव लोगों की संख्‍या में कमी आने और इसका आंकड़ा चार अंकों तक ही रह जाने के दावों के बीच अस्‍पतालों को भी थोड़ा बहुत सांस लेने का मौका मिलता दिखाई दे रहा है।

ये सारी स्थितियां सरकार की तरफ से किए जाने वाले प्रयासों के साथ-साथ लोगों में एक बार फिर कोरोना को लेकर फैले डर का ही नतीजा है। दरअसल कोरोना के पहले दौर को हमने इसलिए संभाल लिया था क्‍योंकि लोग उस समय इस बीमारी से डरे थे और लापरवाही के बजाय एहतियात बरतने पर उन्‍होंने ध्‍यान दिया था। लेकिन धीरे-धीरे यह डर खत्‍म हो गया और एहतियात के तमाम उपायों की भी सरेआम धज्जियां उड़ने लगीं। और इसी लापरवाही ने कोरोना की दूसरी लहर को हमें दबोचने का मौका दे दिया।

दूसरी लहर के शुरुआती दौर में जो अफरा तफरी मची थी उसके चलते रेमडेसिविर की कमी और ऑक्‍सीजन संकट के कारण जिन लोगों को जान गंवानी पड़ी, उनको वापस तो नहीं लाया जा सकता और न ही उनके परिवारों का दर्द कम किया जा सकता है। सरकार और समाज सिर्फ इतना ही कर सकते हैं कि उनके दर्द पर मरहम लगाने का उपक्रम करें और कोशिश करें कि अतीत और वर्तमान का जो कष्‍ट, जो पीड़ा वो भोग रहे हैं, भविष्‍य में उन्‍हें इसे न भोगन पड़े।

इस लिहाज से गुरुवार को मुख्‍यमंत्री शिवराजसिंह चौहान का यह ऐलान बहुत मायने रखता है कि कोरोना संक्रमण से बेसहारा हुए बच्चों, परिवारों की चिंता सरकार करेगी। बेसहारा परिवारों को पेंशन, निशुल्क राशन, बच्चों को निशुल्क शिक्षा जैसी सुविधाएं देने वाला मध्यप्रदेश पहला राज्‍य बन गया है। कारोना के संकट काल में सरकार की ओर से की गई इस पहल का स्‍वागत किया जाना चाहिए।

मुख्‍यमंत्री ने कहा कि कोरोना महामारी ने कई परिवारों को तोड़ कर रख दिया है। कई परिवार ऐसे हैं जिनके बुढ़ापे की लाठी, जिनके सहारे छिन गए हैं। कुछ परिवार ऐसे हैं जिनमें मासूम बच्चों के सिर से अपने पालक, अपने माता-पिता या अभिभावक का साया उठ गया है। ऐसे बच्चों के सामने अब जीवनयापन की समस्या खड़ी हो गई है। इसलिए सरकार ने फैसला किया है कि ऐसे बच्चे जिनके परिवार से पिता या अभिभावक का साया उठ गया है और घर में कोई कमाने वाला नहीं है, उनके परिवारों को 5000 प्रति माह पेंशन दी जाएगी ताकि बच्चों को जीवन यापन के लिए परेशान ना होना पड़े। ऐसे सभी बच्चों की शिक्षा का निशुल्क प्रबंध किया जाएगा ताकि वह अपनी पढ़ाई लिखाई जारी रख सकें।

पात्रता ना होने के बावजूद ऐसे परिवार को फ्री राशन दिया जाएगा ताकि उनके भोजन का इंतजाम हो सके। अगर इन परिवारों में कोई सदस्य ऐसा है या हमारी ऐसी कोई बहन जिसके पति नहीं रहे और वो कोई काम धंधा करना चाहता है तो उनको सरकार की गारंटी पर बिना ब्याज का ऋण इसके लिए उपलब्ध करवाया जाएगा ताकि वह फिर से अपने जीवनयापन के लिए कोई न कोई काम शुरू कर सके।

मख्‍यमंत्री ने कहा कि ऐसे दुखी परिवारों को हम बेसहारा नहीं छोड़ सकते, उनका सहारा हम हैं, प्रदेश की सरकार है। ऐसे बच्चों को भी चिंता करने की जरूरत नहीं है, वो प्रदेश के बच्चे हैं, प्रदेश उनकी देखभाल करेगा, प्रदेश उनकी चिंता करेगा।

दरअसल जनकल्‍याणकारी सरकारों से इसी तरह की एप्रोच की अपेक्षा की जाती है। खासतौर से किसी संकट के समय तो सरकारों की यह जिम्‍मेदारी और बढ़ जाती है। और फिर कोरोना तो इतना बड़ा संकट लेकर आया है जिसकी कल्‍पना भी किसी ने नहीं की थी। पर हमें यह भी ध्‍यान रखना होगा कि इस तरह की घोषणाएं सिर्फ घोषणा बनकर न रह जाएं। उनका सार्थक स्‍वरूप में जमीन पर उतरना और उन पर प्रभावी अमल भी होना जरूरी है। इसके लिए सरकारी तंत्र को मुस्‍तैद और पाबंद करना होगा। पहला काम ऐसे हितग्राहियों की पहचान का है जिसके प्रयास अभी से शुरू कर दिए जाने चाहिए।

जाने वाला व्‍यक्ति तो अचानक चला जाता है और उसके जाते ही परिवार तत्‍काल संकट में आ जाता है, इसलिए जरूरी है कि ऐसे पीडि़तों को मदद भी तत्‍काल मिले। उसकी सरकारी खानापूरी में कम से कम समय लगे। शिक्षा और रोजगार की व्‍यवस्‍था तो एक बार के लिए थोड़ा इंतजार भी कर सकती है लेकिन भोजन की व्‍यवस्‍था तो रोज करना होती है। ऐसे परिवारों में, जहां कमाने वाला कोई नहीं रहा, परिवार के सामने खाने के भी लाले पड़ने की स्थिति है, उनके लिए तत्‍काल राहत का कोई मैकेनिज्‍म बनना चाहिए।

योजनाओं और नीतियों के स्‍तर पर आमतौर पर कोई बदनीयती नहीं होती। उनका उद्देश्‍य लोगों की भलाई ही होता है, लेकिन असली दिक्‍कत उन्‍हें अमल में लाने के तौरतरीकों को लेकर होती है। उम्‍मीद की जानी चाहिए कि मुख्‍यमंत्री ने जिस संवेदनशीलता के साथ यह घोषणा की है, अफसरशाही भी उतनी ही संवेदनशीलता और तत्‍परता से इसे लागू करने के लिए आगे आएगी। पीडि़तों और जरूरतमंदों को अनावश्‍यक सरकारी नियम कायदों और कागजी खानापूरी की अंतहीन प्रक्रिया और उससे पैदा होने वाले दर्द से नहीं गुजरना पड़ेगा। (मध्‍यमत)
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