डॉ. अजय खेमरिया

मोदी सरकार के सर्वश्रेष्ठ समकालीन मंत्रियों में एक नरेंद्र सिंह तोमर का राजनीतिक वैशिष्ट्य केवल देश के सफलतम ग्रामीण विकास या कृषि मंत्री के रूप में ही नहीं है। वे भारत में लोकतंत्र की असल ताकत के जीवंत प्रतीक भी है। 70 साल की गणतन्त्रीय विरासत को आम गण की भागीदारी के नजरिये से समझा जाएगा तो नरेंद्र सिंह तोमर जैसी शख्सियतों की जीवनयात्राओं को रेखांकित किये बिना यह विश्लेषण पूरा नही होगा। असल में नरेंद्र सिंह तोमर नैराश्य से भरे  भारत के संसदीय जीवन में भरोसे और मजबूती के प्रतिनिधि भी है। संघर्ष, समर्पण, अनुशासन और ध्येयनिष्ठा के एक परिणामोन्मुखी गौरव का नाम भी उन्हें दिया जा सकता है। वे उन करोडों नागरिकों के बीच भरोसे का भाव जाग्रत करते हैं जिनकी अपनी कोई निजी समृद्ध वंश परम्परा नहीं रही है। जिन्‍होंने अपने पुरुषार्थ से लोकजीवन में अनुकरणीय मिसाल स्थापित की है।

देश के नीति निर्माण में नरेंद्र सिंह तोमर की प्रमुख भागीदारी इस गौरवमयी और अनुकरणीय सन्देश को भी समाज जीवन में प्रतिस्थापित करती है कि सियासत केवल धूर्तता, बेईमानी, अंध प्रतिस्पर्धा और धनी मानी पृष्ठभूमि से ही निर्धारित नहीं होती है, बल्कि ईमानदारी और अनुशासन ही इसका शाश्वत पथ है। ग्वालियर की धरती ने भारत की संसदीय परम्परा को नायाब नगीने दिये हैं अटल जी, माधवराव सिंधिया, राजमाता सिंधिया की महान संसदीय परम्परा को नरेंद्र सिंह तोमर ने जिस खूबसूरती और विशिष्टता के साथ आगे बढ़ाया है वह सबके लिए गौरवान्वित करने वाला लोक विमर्श भी है।

इसे इस अर्थ में भी समझने की जरूरत है कि कैसे एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार का युवा अपने ध्येय के लिए समर्पित भाव से आगे बढ़ता है और यह संसदीय व्यवस्था कैसे इसे अपने आँचल से संपुष्ट करते हुए देश के सियासी नवरत्नों में स्थापित कर देती है। सिर्फ़ सत्ता के लिए सियासत का वरण करने वाले नए लोगों के लिए नरेंद्र सिंह तोमर एक रोल मॉडल भी हैं। लेकिन इस मॉडल में कोई शॉर्ट कट नहीं है, एक पूरी साधना है, एक अनुशासन है, एक वैचारिक अधिष्ठान है और इन सबके साथ संयम एवं संतुलन का एक अति विशिष्ट समावेश भी।

नरेंद्र सिंह तोमर होने का मतलब अपने आप में एक संगठन शास्त्र भी है। जो यह बुनियादी सीख देता है कि यह जीवन केवल सत्ता के लिए नहीं बल्कि समाज के लिए भी समानांतर रूप से उपयोगी है। जब आप समाज के लिए अपने संगठन के माध्यम से स्वयं को समर्पित कर देते है तब यह समाज और संगठन व्यवस्था खुद आपको नरेंद्र सिंह तोमर बना देती है।

वाल्मीकि रामायण में राम का वैशिष्ट्य रेखांकित करते हुए लिखा गया है कि राम असंभवों में समन्वय है। नरेंद्र सिंह राम के इसी सन्देश को पकड़कर चलने वाले अद्भुत सियासी चरित्र हैं। वे कद में जितने छोटे है, संभाषण में जितने मितभाषी हैं, कमोबेश पराक्रम और पुरुषार्थ में उतने ही प्रबल हैं। वे असंभवों में समन्वय के समुच्चय हैं। वे सहिष्णुता के अधिष्ठाता हैं। मप्र की सियासत में वे अकेले ऐसे नेता हैं जिनका कोई राजनीतिक शत्रु नहीं है। यही उनकी समन्वयक की असली निशानी है। यही उनका मौलिक वैशिष्ट्य है जो उन्हें अद्भुत बनाता है। यही एकमात्र कारण है कि दिल्ली दरबार में एक से एक एकेडेमिक्स पृष्ठभूमि वाले नेताओं के इतर दुनिया के सबसे लोकप्रिय और ताकतवर नेताओं में एक नरेंद्र मोदी को ग्वालियर के आर्यनगर की तंग गली से आया यह शख्स पसन्द आता है।

हर कठिन टास्क को बगैर तनाव और शोर शराबे के अंजाम तक पहुंचाने की निष्णात विद्या में नरेंद्र सिंह के आगे कोई नहीं टिकता है, फिर चाहे मामला कृषि और ग्रामीण विकास को नया जनोन्मुखी चेहरा देना हो या सियासी कूटनीतिक ऑपरेशन। हर मोर्चे पर नरेंद्र सिंह ने खुद को प्रमाणित किया है। वे पार्टी के ऐसे नेता हैं जो हर काम को आज भी कार्यकर्ता भाव के साथ करते है। जरा सोचिये नरेंद्र सिंह आज जिस ताकतवर मुकाम पर हैं वहाँ होकर कोई अहंकार और गलतफहमी का शिकार क्यों न हो? लेकिन नरेंद्र सिंह अगर इस सबसे से अछूते हैं तो इसके पीछे उनकी मजबूत वैचारिकी और जड़ों से जुड़ाव ही है।

वैचारिक दृढ़ता ही उन्हें अपने कार्यकर्ता भाव को खुद के विराट हो चुके व्यक्तित्व से ओझल नहीं होने देती है पिछले चार विधानसभा चुनावों में लोगों ने उन्हें पार्टी के संकटमोचक की भूमिका में देखा। 2008 और 2013 में उनके संगठन कौशल की मिसाल आज देश भर में नजीर के तौर पर दी जाती है। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का यह कहना कि “हम दो जिस्म एक जान हैं” असल में सत्ता और संगठन के समन्वय का एक अद्वितीय दर्शन ही है। यह साम्य ठीक वैसा ही जैसा मोदी जी और अमित शाह में चुनावी अभियानों में दिखता रहा है। यानी सत्ता और संगठन दोनों के लिए नरेंद्र तोमर ने एक नया व्याकरण रचा जिसे आज की उनकी मौजूदा पोजीशन के निर्धारक तत्व के रूप में समझने की भी आवश्यकता है।

हर छोटे बड़े चुनाव में उनकी भूमिका को भी बारीकी से समझने की जरूरत। 22 -22 घण्टे वह टिकटार्थियों के उन्मादी समर्थकों के साथ शांत भाव से मुकाबिल होकर उन्हें व्यक्ति से बड़ा दल, दल से बड़ा देश का पाठ पढ़ाकर बूथ पर लगाने का करिश्मा कैसे कर लेते है, इसे उनकी संगठन शिल्पता के और स्वीकार्यता के साथ समझने की जरूरत है। नरेन्द्र सिंह डायबिटिक हैं लेकिन पिछले 30 सालों से उन्हें किसी ने गुस्साते या झुंझलाते हुए नहीं देखा है। आप उनकी मुसकुराहट से उनकी प्रसन्नता का आकलन तो कर सकते हैं लेकिन किसी भाव भंगिमा से आप उनकी नाराजगी का अंदाजा नहीं लगा सकते। इसका मतलब यह नहीं है कि सियासत की निर्ममता औऱ बदले के गुर उनसे अछूते हैं। सियासी उद्वेलन की सरिता का आवेग उनके मन मस्तिष्क में भी तटबंध तोड़कर हिलोरें लेता है।

03 कृष्‍ण मेनन मार्ग के लॉन में कमलनाथ सरकार के पतन की पटकथा लिखते ग्वालियर महाराजा के चित्र उनकी इसी खूबी का नजारा था। अटल जी ने ग्वालियर मेले में घूमते हुए ये पंक्तियां लिखी थीं-
भीड़ में खो जाना
यादों में डूब जाना
अस्तित्व को अर्थ देता है
जीवन को सुगन्ध देता है
देश के ग्रुप ऑफ मिनिस्टर के सदस्य नरेंद्र सिंह आपको अपने इलाके की चाय की दुकानों या पानी पूरी के ठेले पर आनंद तलाशते मिलें तो वे अपने अस्तित्व को अर्थवान और जीवन को अपनत्व से सुगन्धित करते ही दिखते है। ऐसे सुगन्धित जीवन की खुशबू अनवरत बिखरती रहे। आज जन्मदिन पर सबकी यही कामना है।