हेमंत पाल

मकर संक्रांति के त्योहार पर उत्तर भारत में तिल-गुड़ खाने के अलावा कई तरह के रिवाज निभाए जाते हैं। इस दिन दान और स्नान का भी विशेष महत्व है। लेकिन, उत्तर भारत में सबसे अनोखा रिवाज है पतंग उड़ाने का। पतंग का संक्रांति के साथ अलग ही महत्व है। यही कारण है कि मकर संक्रांति को पतंग पर्व के नाम से भी जाना जाता है। देश के कई राज्यों में इस दिन पतंग उड़ाने की परंपरा है, खासकर गुजरात में तो बहुत ज्यादा।

इस दिन पतंग उड़ाने के पीछे एक पौराणिक कथा है कि मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा भगवान श्री राम के समय में शुरू हुई थी। इसके साथ कुछ वैज्ञानिक महत्व भी हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि पतंग उड़ाने की क्रिया सेहत के लिए काफी फायदेमंद है। सुबह की धूप में पतंग उड़ाने से शरीर को ऊर्जा मिलती है। साथ ही विटामिन-डी भी भरपूर मिलता है। धूप में वक्त बिताने से सर्दियों में होने वाली त्वचा संबंधी समस्याओं से छुटकारा मिल जाता है।

पतंग ने न केवल संस्कृति और समाज में लोकप्रियता बटोरी, बल्कि सिनेमा के परदे पर भी पतंग खूब उड़ी। लाल, हरी, नीली, पीली और रंग-बिरंगी पतंगें जब आसमान में लहराती है, तो ऐसा लगता है मानो इन पतंगों के साथ हमारे सपने भी हकीक़त की ऊंचाइयों को छू रहे हैं। सभी गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे की पतंगों के पेंच लड़ाते हैं।

लेकिन, इन पतंगों के बहाने प्रेम की पींगे भी खूब भरी गई। ये पतंगें हीरो-हीरोइन के कई प्रेम प्रसंग की साक्षी बनी हैं। यह सारे रंग फिल्मों में भी कई बार दिखाई दिए। 1960 में ‘पतंग’ नाम से एक फिल्म भी आई थी। इसमें राजेंद्र कुमार, माला सिंहा, रणधीर, राजमेहरा, मनोरमा और अचला सचदेव ने काम किया था। फिल्म का नाम ‘पतंग’ क्यों रखा, यह तो निर्माता ही जाने, पर इस फिल्म में ‘पतंग’ पर आधारित दो गीत ‘यह दुनिया पतंग नित बदले हैं रंग’ था जो एक बार सुखद और दूसरी बार दुखद था।

इसके बाद कई बार फिल्मों में पतंग पर आधारित गीत और प्रसंग तो आते रहे, लेकिन फिल्म के शीर्षक से पतंग नदारद हो गई। 11 साल बाद ‘कटी पतंग’ ने इस सूनेपन को दूर किया। फिल्म की नायिका की स्थिति को चित्रित करने वाले शीर्षक की यह फिल्म राजेश खन्ना और आशा पारेख के अभिनय और आरडी बर्मन के संगीत के कारण खूब चली। यह बात और है कि केवल एक गीत ‘ना कोई उमंग है’ के दौरान ही पतंग इस फिल्म में पर्दे पर दिखाई दी।

फिल्म इंडस्ट्री का चेहरा जैसे-जैसे बदलता गया, परदे पर पतंग भी रंगीन होती गई। साथ ही पतंग से जुड़े गाने और उनके सीन भी ज्यादा दिलचस्प और मजेदार होते गए। फिल्मों के कुछ ऐसे गीत भी बने जो इस दिन की मस्ती, उड़ती पतंग के उतार-चढ़ाव को हमारी जिंदगी से जोड़कर बेहद ही खूबसूरती से बयां करते हैं। जिन फिल्मों में पतंग शीर्षक या पतंग पर आधारित गीत नहीं होते, ऐसी कुछ फ़िल्मों में भी पतंगबाजी के दृश्यों ने दर्शकों को खूब लुभाया। ऋतिक रोशन की फिल्म ‘काइट’ का नाम जरूर पतंग का अंग्रेजी शब्द था, पर फिल्म में पतंग का कोई जिक्र नहीं था।

फिल्मों में और रियल लाइफ दोनों में पतंग उड़ाने में सलमान खान का कोई जवाब नहीं। उन्होंने अहमदाबाद में प्रधानमंत्री के साथ संक्रांति पर पतंग उड़ाई। इसके अलावा सुल्तान, बजरंगी भाई जान और ‘दिल दे चुके सनम’ में भी पतंग के दृश्य दिखाई दिए थे। ऐश्वर्या रॉय के साथ उन्होंने ‘हम दिल दे चुके सनम’ में छत पर प्यार की पतंग के साथ वास्तविक पंतग भी उड़ाई थी। ‘दिल्ली 6’ में भी पतंगबाजी के जानदार दृश्य देखने को मिले।

कहा जाता है कि फिल्म इंडस्ट्री में दिलीप कुमार ऐसे अभिनेता थे, जिनको वास्तव में पतंग उड़ाने में महारथ हासिल थी। जब वह अपनी छत से पतंग उड़ाते थे, तो इंडस्ट्री के कई दिग्गज निर्माता उनकी पतंग के साथ डोर की चरखियां थामने को बेकरार रहते थे। गायक मोहम्मद रफ़ी का भी सबसे प्रिय शौक था पतंग उड़ाना। उनकी पतंग काले रंग की हुआ करती थीं। इसलिए कि हवा में उड़ती काली पतंग इस बात का संकेत होती थी, कि रफ़ी अपने घर की छत पर पतंग उड़ा रहे हैं। वे पतंग के लिए मांजा पंजाब से मंगवाते थे। हमेशा मृदु भाषी रहने वाले रफ़ी पतंग के मामले में प्रतिस्पर्धी हो जाते थे। उनको किसी से भी पतंग कटवाना पसंद नहीं था।

जहां तक फिल्मों में गीतों की बात है। फिल्मों में पतंग पर कई गाने बने। पतंग पर आधारित गीतों का सिलसिला 1949 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल्लगी’ से शुरू हुआ। फिल्म का गीत ‘मेरी प्यारी पतंग चली बादलों के संग’ तब बहुत ज्यादा लोकप्रिय हुआ था। इसके बोल इतने सीधे और दिल में उतरने वाले थे कि हर आदमी पतंग उडाते समय यही गीत गुनगुनाते दिखाई देता था। ऐसा ही एक गीत 1957 की फिल्म ‘भाभी’ में जगदीप और नंदा पर फिल्माया गया ‘चली चली रे पतंग मेरी चली रे’ था। फिल्म में पतंग को उत्सव की तरह दिखाता यह गीत आज भी मकर संक्रांति पर हर टीवी चैनल और रेडियो पर सुनाई देता है।

फिल्म ‘रईस’ का सुखविंदर और भूमि त्रिवेदी का गाया गीत ‘उडी उडी जाए’ पतंग उड़ाने का मजा देते हुए झूमने पर मजबूर कर देता है। फिल्म ‘काई पो छे’ के ‘मांझा’ गीत में जिंदगी के एक नए नज़रिए को दिखाने की कोशिश की गई। ये गीत पतंग, आसमान, उड़ान और मांझे के इर्द-गिर्द घूमता है जिसके जरिए जिंदगी, रिश्ते और जज़्बे की दास्तां बयां की गई। फिल्म तीन दोस्तों और उनके सपनों को पूरा करने के जज़्बे की कहानी थी।

फिल्म ‘हम दिल दे चुके सनम’ का ‘ढील दे दे रे भैया’ गीत पतंग उड़ाने के दौरान अक्सर लोगों के मुंह से निकल ही आता है। यह गाना काफी लोकप्रिय भी हुआ था। फिल्म ‘अर्थ’ के गीत ‘रुत आ गई रे’ में आमिर खान फिल्म की नायिका को पतंग उड़ाना सिखा रहे होते हैं। यह एक रोमांटिक गीत है जिसे एआर रहमान ने अपनी आवाज़ दी है। फिल्म ‘फुकरे’ के गीत ‘अम्बर सरिया’ में भले ही पतंग शब्द का जिक्र न हुआ हो, लेकिन इसमें पतंगबाजी के दौरान होने वाली अठखेलियों को बड़े ही मजेदार ढंग से दर्शाया गया है।

पतंग पर अपनी प्रेमिका को प्यार भरा मैसेज लिखकर भेजना दर्शकों को उस दौर में ले जाता है, जब छतों पर पतंगों के जरिए प्यार हुआ करता था। ‘गबरू गैंग’ देश में पतंगबाजी पर बनी दुनिया की पहली फिल्‍म है। खास बात यह कि सनी देओल की फिल्‍म ‘घायल: वन्‍स अगेन’ से सिनेमाई पर्दे पर अपनी छाप छोड़ने वाले अभिलाष कुमार इस फिल्‍म में भी एंटी हीरो के अवतार में नजर आए। मेकर्स का कहना है कि यह दुनिया में काइट फ्लाइंग कॉम्‍पीटिशन पर बनी पहली फिल्‍म है। फिल्‍म की प्रोड्यूसर आरती पुरी के मुताबिक पतंगबाजी के साथ ही फिल्‍म में दोस्‍ती, रोमांस और इमोशंस का मिक्‍स भी रखा गया है।

इसे पतंगबाजी की लोकप्रियता का प्रमाण माना जाना चाहिए कि अमिताभ बच्चन अपनी फिल्म ‘शमिताभ’ के प्रमोशन के लिए पतंग उड़ाने अहमदाबाद पहुंच गए। पिछले लोकसभा चुनावों से ठीक पहले सलमान खान और नरेंद्र मोदी ने साथ-साथ डोर पकड़ी थी। जाहिर है, पतंगबाजी की लोकप्रियता भुनाने में सियासी तबका भी पीछे नहीं रहता।
(लेखक की सोशल मीडिया पोस्‍ट से साभार)
(मध्यमत)
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